खुशी सुसाइड केस क्या हकीकत में एडमिट कार्ड को लेकर खुशी ने की थी आत्महत्या ?

शिक्षा के मंदिर में हंगामे के लिए जिम्मेदार कौन ?


 झांसी का चर्चित आत्महत्या मामला



एक छात्रा की संदिग्ध हालातों में मौत के बाद शव को लेकर एक दर्जन लोग  गेट मैन को धमकाते हुए स्कूल परिसर में प्रवेश करते हैं। शव को बेरहमी से बिल्डिंग के अंदर फर्श पर पटककर नारेबाजी करने लगते हैं। परिसर में एक और घटना को जानने की उत्सुकता का सन्नाटा और दूसरी और नारेबाजी कर रहे लोगों की उत्तेजना से उत्पन्न हंगामा। पुलिस के आने के बाद समझ आया कि स्कूल की छात्रा ख़ुशी का शव लेकर उसका पिता स्कूल प्रबंधन पर उत्पीड़न कर उसकी पुत्री को आत्महत्या के लिए मजबूर कर देने का आरोप लगा रहा है। 
हालातों के चलते पुलिस ने मृतक छात्रा ख़ुशी के पिता संजय की तहरीर पर स्कूल प्रबंधन के दो तथा प्रधानाचार्या, कक्षाध्यापिका सहित चार लोगों पर आरोप की सम्बंधित धारा के साथ मुकदद्मा पंजीकृत कर लिया। इस घटना को निर्भया जैसा रूपांतरित स्वरुप दिलाने के लिए जनांदोलन का प्रयास भी जारी है। अनेक  बार कुछ लोग नियोजित योजना को फलीभूत करने का स्वार्थ सिद्ध करने में सक्रीय


 


भूमिका का निर्वाहन करते हैं। जो ख़ुशी प्रकरण में भी देखने को मिल रहा है। जहां तक एडमिट कार्ड को लेकर सुसाइड का कारण बताया जा रहा है तो



वहीं दूसरी ओर इस सी सी टी वी फुुुटेज में अगर आप देखें तो यह 20 तारीख का फुटेज है जिसमें आप साथ देख सकते हैं मृतका खुशी अपने पिता के साथ खुश दिखाई दे रही है पर पता नहीं दो-तीन दिन में ऐसा क्या हो गया क्यों खुशी ने सुसाइड कर लिया


हक़ीक़त को नजर अंदाज करना पड़ेगा मंहगा...


एक और जहां शिक्षा का व्यवसायीकरण चरम पर है तो दूसरी और इस व्यवसाय में प्रतिस्पर्धा में अब्बल साबित होने का जूनून स्कूल प्रबंधन समितिओं में शुमार है। महानगर में तमाम नामचीन लोगों ने शिक्षा के क्षेत्र में धमाकेदार दावा प्रस्तुत किया है। जिनका सरोकार शिक्षा से नहीं रहा वह भी पहलवानों की तरह अखाड़े में कूदे। यहां दावे के साथ कहना लाजमी है कि शराब वाला , अखबार वाला , दवाई वाला , नेता - मंत्री- विधायक -सांसद , जमीन कारोबारी , माफिया तथा दबंगों का कब्जा शिक्षा के इस क्षेत्र में होता जा रहा है फिर ऐसे में महानगर के प्रतिष्ठित और स्थापित हंसराज मॉडर्न पब्लिक स्कूल से सभी अपनी तुलना करने में लगे हैं। शिक्षा के इस पवित्र मंदिर की बुनियाद के पीछे संघर्ष और आदर्श व्यक्तित्व की भूमिका को नकारना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। 


एडिटर अन्सार खान पत्रकार


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